बुरे वक़्त में ही पता चलता है कि कौन अपना है और कौन पराया

w3सुख के सब साथी………….. दुःख में ना कोई…………..

ये लाइन अपने आप में बहुत कुछ कहती है। इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि अपने और पराये का पता मुसीबत में ही चलता है। बुरे वक़्त में ही पता चलता है कि कौन हमारा अपना है और कौन पराया?

हमारे आस पास बहुत से लोग होते है। जिनमे हमारा परिवार, हमारे दोस्त, रिश्तेदार, पास पड़ोस के लोग होते है। सभी के साथ हमारा उठना बैठना होता है। हमें सभी हमारे अपने जैसे ही लगते हैं और आमतौर पर सभी कहते हैं कि हम हमेशा आपके  साथ है, हर ज़रूरत में आपके साथ हैं। पर क्या वास्तव में ऐसा होता है।

नहीं……… हमेशा ऐसा नहीं होता। ऐसा सिर्फ तब तक होता है जब तक हम सुखी हैं जब तक हमारा समय अच्छा चल रहा है जब तक हमारे पास रुपया, पैसा, धन, दौलत है। जब तक हमारा समय अच्छा चल रहा होता है तब तक सभी हमें पूछते है हमारा सम्मान करते हैं।

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लेकिन अगर हम पर थोड़ी सी मुसीबत आ जाये, बुरा वक़्त पड़ जाये तो हमारे ये ही अपने हमें छोड़ जाते है। हमसे दूर हो जाते हैं। हमसे रिश्ता तक तोड़ लेते हैं। और ऐसा करने वाले सिर्फ बाहर के ही लोग नहीं होते, हमारे सगे सम्बन्धी तक, घर के लोग, चाचा, ताऊ, मामा, फूफा, पत्नी, भाई तक भी बुरे वक़्त में हमसे मुँह मोड़ लेते है।

गर्दिश में वो कोसों दूर हैं क्यों, जो साथ थे मेरे बहारों में,
साये की तरह छोड़ा तन्हा, अपनों ने मुझे अँधियारों में,

बुरे वक़्त की ऐसी ही एक कहानी मैं आपके सामने पेश कर रहा हूँ। आशा करता हूँ कि आपको पसंद आएगी।

एक समय एक गाँव में एक जौहरी का परिवार रहता था। पूरे परिवार का खर्च जौहरी की आमदनी से ही चलता था। एक दिन जौहरी की मृत्यु हो गयी। जौहरी की मृत्यु के बाद उसका परिवार संकट में पड़ गया। खाने तक के भी लाले पड़ गए। एक दिन जौहरी की पत्नी ने अपने बेटे को हीरे का एक हार देकर कहा – बेटा, इसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाओ और उनसे कहना इसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।

बेटा वह हार लेकर चाचा के पास गया। चाचा ने हार को अच्छी तरह से जाँच परखकर कहा – बेटा, माँ से कहना कि अभी बाजार बहुत मंदा है। थोड़ा रुककर बेचना, अच्छे दाम मिलेंगे। और उसे कुछ रुपये देकर कहा कि तुम कल से दुकान पर आकर बैठना। अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहां हीरों रत्नो की परख का काम सीखने लगा।

एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया। लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने आने लगे। एक दिन उसके चाचा ने कहा, बेटा अपनी माँ से वह हार लेकर आना और कहना कि अब बाजार बहुत तेज है, उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।

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माँ से हार लेकर उसने परखा तो पाया कि वह हार तो नकली है। वह उसे घर पर ही छोड़ कर वह तुरंत दुकान पर लौट आया।

चाचा ने पूछा – हार नहीं लाए?
उसने कहा, वह तो नकली था।

तब चाचा ने उससे कहा – जब तुम पहली बार हार लेकर आये थे, तब अगर मैं उसे नकली बता देता तो तुम सोचते कि आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचा हमारी असली चीज को भी नकली बताने लगे।

लेकिन आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो तुम्हे पता चल गया कि हार सचमुच नकली है। सच यह है कि ज्ञान के बिना इस संसार में हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं, सब गलत है। और ऐसे ही गलतफहमी का शिकार होकर रिश्ते बिगडते है।

दोस्तों, अपनों का यह मतलब नहीं है कि हमारे घरवाले, परिवार वाले, दोस्त, रिश्तेदार, सगे सम्बन्धी ही हमारे अपने होते हैं। अपने तो वे लोग होते है जो हमारे बारे में सोचते है, हमारी खुशी के बारे में सोचते हैं, हमारे शुभचिंतक होते हैं और हमारे हर सुख दुःख में साथ है। फिर चाहे वो कोई भी हों। अपनों और परायों का पता मुसीबत में ही चलता है। जो हमारा वास्तव में अपना होगा वो किसी भी परिस्थिति में हमसे मुँह नहीं मोड़ेगा। वो हर मुसीबत, हर विपत्ति, बुरे वक़्त में हमारे साथ रहेगा। हमें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा। वो बुरे वक़्त में हमें हिम्मत देगा और उस परिस्थिति से निकलने में हमारी मदद करेगा।

किसी ने सही कहा है।

ज़रा सी गर्दिश पर ,ना छोड़ किसी अपने का दामन,
ज़िंदगी बीत जाती है, अपनो को अपना बनाने में।

 

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