आप क्या हैं दुर्जन या सज्जन

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आप क्या हैं दुर्जन या सज्जन ? ( What are you evil or gentleman?)

dronacharyaये इंसान की प्रवृति है कि इंसान खुद अपने दिल से, अपने मन से जैसा होगा उसे दूसरे लोग भी वैसे ही नज़र आयेंगे। अगर कोई व्यक्ति दिल का बहुत अच्छा है, ईमानदार है, दूसरों की मदद करने वाला है, तो उसे सभी लोग अपने जैसे ही लगेंगे। चाहे वे लोग दिल से कितने भी बुरे व्यक्ति हो। चाहे उनके अंदर कितने भी अवगुण हों।

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लेकिन अगर कोई आदमी दिल से, मन से काला है, बुरा इंसान है, उसके मन में चोर है, तो उसे हर इंसान बुरा ही दिखाई देगा। धोखेबाज ही दिखाई देगा। फिर चाहे सामने वाला कितना भी अच्छा इंसान क्यों न हो। दिल का बुरा इंसान कभी भी किसी का भला नहीं कर सकता। उसे हर एक इंसान में बुराई ही नज़र आएगी।

हमारी सोच हमारे कर्म जैसे होते हैं। हम वैसे ही बन जाते हैं और दूसरे लोग भी हमें वैसे ही नज़र आते हैं। आइये इस बात को नीचे दी गयी कहानी से समझते हैं।

महाभारत के बारे में सबने पढ़ा और सुना है। महाभारत से पहले गुरु द्रोणाचार्य कौरवों तथा पांडवों को शिक्षा दिया करते थे और अपनी दी हुई शिक्षा के बारे में वे सभी राजपुत्रों की परीक्षा भी लेते रहते थे।

एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को अपने पास बुलाकर कहा – ‘युधिष्ठिर! तुम राजधानी में जाओ और पता लगाओ कि ऐसे कितने लोग हैं, जिन के अंदर अवगुण है और उन्हें दुर्जन लोगों की श्रेणी में रखा जा सकता है।’ युधिष्ठिर ने कहा – ‘जो आज्ञा गुरुदेव।’ इतना कहकर युधिष्ठिर ने प्रस्थान किया।

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थोड़ी ही देर में गुरुदेव ने दुर्योधन को आवाज लगाई। दुर्योधन तुरंत उपस्थित हुआ और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया तथा कहने लगा- ‘गुरुदेव, आपने मुझे पुकारा था, कहिए क्या आदेश है?’ गुरुदेव ने कहा – ‘दुर्योधन! तुम राजधानी में जाकर मालूम करो कि राजधानी में कितने लोग ऐसे हैं जिनमे कोई अवगुण नहीं है और उन्हें सज्जन लोगों की श्रेणी में रखा जा सकता है।’ दुर्योधन भी सिर झुकाकर बोला- ‘जो आज्ञा गुरुदेव’ और आदेश का पालन करने निकल पड़ा।

दोनों राजपुत्र गुरु के बताए कार्य पर विस्तृत अध्ययन करके एक के बाद एक करके लौटे। पहले युधिष्ठिर ने आकर अपने आकलन का सार प्रस्तुत किया और बोले – ‘गुरुदेव! मुझे तो राजधानी में बहुत ढूंढने पर भी कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसके अंदर अवगुण हों या उसे दुर्जन व्यक्ति की श्रेणी में रखा जा सकता है।’ गुरुदेव ने कहा- ‘अच्छा, तुम जाओ।’

कुछ पलों के बाद दुर्योधन उपस्थित हुआ और गुरुदेव को प्रणाम करके बोला- ‘गुरुदेव! मैंने राजधानी में सज्जनों की गहन खोज-पड़ताल की, लेकिन ऐसा लगा कि यहां सज्जनों का अकाल पड़ गया है। हर एक व्यक्ति में बहुत से अवगुण हैं।’

द्रोणाचार्य यह सुन कर मुस्कराए। फिर उन्होंने सभी राजपुत्रों के साथ युधिष्ठिर और दुर्योधन को बुलवाया। तत्पश्चात इन दोनों के निष्कर्षों की व्याख्या की। गुरुदेव ने कहा- ‘चूंकि युधिष्ठिर सज्जनता के अवतार हैं अतः उन्हें सदा सर्वदा सज्जन ही नजर आते हैं। यहां तक कि दुर्जन में भी सज्जन के गुण दिखाई देते हैं। उसी कारण उन्हें कोई दुर्जन व्यक्ति नहीं मिला। दूसरी ओर दुर्योधन को कोई सज्जन पुरुष नजर नहीं आया, क्योंकि उनकी रुचि सज्जनता में जरा भी नहीं है।’

दोस्तों, ये बात हम सबको भी पता है कि युधिष्ठिर एक सज्जन, मर्यादापुरुषोत्तम थे। वे हमेशा सत्य बोलते थे तथा हमेशा सत्य तथा धर्म की रक्षा करते थे। जीवों पर, निर्बलों पर दया करते थे और असहाय लोगों की मदद करते थे। उनके अंदर किसी तरह का कोई अवगुण नहीं था और न ही कोई बुराई थी। इसलिए उन्हें सभी व्यक्ति सज्जन दिखाई देते थे।

जबकि दुर्योधन एक छली, कपटी, झूठा, धोखेबाज, असहाय तथा निर्बलों को सताने वाला था। उसके अंदर सारे अवगुण भरे हुए थे। इसलिए उसे हर एक व्यक्ति अपने जैसा दुर्जन दिखाई देता था।

यही बात हम सब पर भी लागू होती है। अगर हमें भी किसी के अंदर कोई बुराई दिखाई देती है तो इसका मतलब है कि वो बुराई किसी ना किसी रूप में हमारे अंदर भी है। तो सबसे पहले हमें अपने अंदर की बुराईयों को ख़त्म करना चाहिए। जब हमारे अंदर की सारी बुराईयां ख़त्म हो जायेंगी तो उसके बाद हमें दूसरे लोगों में भी बुराईयां नहीं दिखेंगी। हमें दूसरों में अच्छाईयां दिखाई देनी शुरू हो जायेंगीं। उनके गुण दिखाई देने शुरू हो जायेंगे। उसके बाद हम एक बेहतर इंसान बनने के साथ साथ दूसरों के साथ अपने सम्बन्धों को भी अच्छा बना लेंगें।

तो अब फैसला आपको करना है कि आपको क्या बनना है युधिष्ठिर या दुर्योधन?

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8 Comments

  1. गंदा सोंचने वाला गंदे कर्म करता है तो कोई उसे अच्छा कैसे कह सकता है मनुष्य जैसा सोचता है वैसा करने भी लगता है और वैसा ही बन जाता है आतंकवादी को सज्जन कहने वाला कोई है क्या?

  2. बहुत ही बढि़या कहानी। आपकी यह रचना पढ़कर मैं कबीर दास जी के एक दोहे का स्‍मरण करने की कोशिश करने लगा। पर वह दोहा मुझे याद नहीं आया। अब किसी किताब में उसे ढूंढने की कोशिश करूगां। सिर्फ इतना ही याद आया कि ”मुझसे बुरा न कोए”

  3. पुष्पेन्द्र जी, बहुत ही बढ़िया कहानी लिखी है आपने. सच है इंसान की भावना जैसी होती है उसे हर इंसान वैसा ही दिखाई देता है.

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