एक हाथ का बच्चा अपनी ज़िद से बना मार्शल आर्ट्स का चैंपियन

एक हाथ का बच्चा अपनी ज़िद से बना मार्शल आर्ट्स का चैंपियन (A one hand child become martial arts’s champion by persistence)

persistenceअगर किसी के अंदर जीतने की जिद है, अपने सपने को पूरा करने का जूनून है और वो जिद, वो जूनून दीवानगी की हद को पार गया है और उसे जीतने के अलावा कुछ और दिखाई ही नहीं देता है, तो फिर दुनिया की कोई भी ताकत उस शख्श को जीतने से नहीं रोक सकती।

जिसने भी एक बार अपने सपनों को पूरा करने की, अपनी मंजिल को पाने की ज़िद कर ली तो फिर कोई भी मुश्किल, कोई भी मुसीबत, पैसे की कमी या कोई भी शारीरिक अक्षमता उस शख्श का रास्ता नहीं रोक सकती। उसे नामुमकिन को मुमकिन बनाने से नहीं रोक सकती। ऐसे शख्श के मजबूत इरादों के आगे हर एक चीज घुटने टेक देती है।

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आज मैं आपके सामने एक ऐसे ही शख्श की प्रेरणादायक कहानी पेश कर रहा हूँ जिसका एक दुर्घटना में बायाँ हाथ कट जाने के बाद भी वो अपनी ज़िद से मार्शल आर्ट्स का चैंपियन बना।

जापान के एक छोटे से कस्बे में एक लगभग 10 साल का बच्चा रहता था। जिसका नाम ओकायो था। ओकायो को जूडो सीखने का बहुत शौक था। लेकिन एक कार दुर्घटना में उसका एक हाथ कट गया था। जिसके कारण उसके माता पिता उसे जूडो सीखने के लिए मना करते थे। लेकिन ओकायो को जूडो सीखने की बड़ी तीव्र जिद थी।  जो समय के साथ लगातार बढ़ती जा रही थी।

आख़िरकार उसके माता -पिता को उसकी जिद के आगे झुकना ही पड़ा और वो ओकायो को नजदीकी शहर के एक मशहूर मार्शल आर्ट्स गुरु के यहाँ ले गए।

गुरु ने जब ओकायो को देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि बिना बाएँ हाथ का यह लड़का आखिर जूडो क्यों सीखना चाहता है ?

उन्होंने ओकायो से पूछा, “ तुम्हारा तो बायाँ हाथ ही नहीं है तो भला तुम दूसरे  लड़कों का मुकाबला कैसे करोगे।”

ओकायो ने कहा “ ये बताना तो आपका काम है”। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मुझे सभी को हराना है और एक दिन खुद “सेंसेई” (मास्टर) बनना है।”

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गुरु उसकी सीखने की दृढ इच्छा शक्ति से काफी प्रभावित हुए और बोले,“ ठीक है मैं तुम्हे सिखाऊँगा लेकिन एक शर्त है, तुम मेरे हर एक निर्देश का पालन करोगे और उसमे दृढ विश्वास रखोगे।”

ओकायो ने सहमती में गुरु के सामने अपना सर झुका दिया।

गुरु ने एक साथ लगभग पचास छात्रों को जूडो सिखाना शुरू किया। ओकायो भी अन्य लड़कों की तरह सीख रहा था। पर कुछ दिनों बाद उसने ध्यान दिया कि गुरु जी अन्य लड़कों को अलग -अलग दांव पेंच सिखा रहे हैं लेकिन वह अभी भी उसी एक किक का अभ्यास कर रहा है जो उसने शुरू में सीखी थी। उससे रहा नहीं गया और उसने गुरु से पूछा,“ गुरु जी आप अन्य लड़कों को नयी -नयी चीजें सिखा रहे हैं, पर मैं अभी भी बस वही एक किक मारने का अभ्यास कर रहा हूँ। क्या मुझे और चीजें नहीं सीखनी चाहियें ?”

गुरु जी बोले,“ तुम्हे बस इसी एक किक पर महारथ हांसिल करने की आवश्यकता है” और वो आगे बढ़ गए।

ओकायो को विस्मय हुआ पर उसे अपने गुरु में पूर्ण विश्वास था और वह फिर अभ्यास में जुट गया।

समय बीतता गया और देखते देखते दो साल गुजर गए, पर ओकायो उसी एक किक का अभ्यास कर रहा था। एक बार फिर ओकायो को चिंता होने लगी और उसने गुरु से कहा,“क्या अभी भी मैं बस यही करता रहूँगा और बाकी सभी नयी तकनीकों में पारंगत होते रहेंगे।”

गुरु जी बोले,” तुम्हे मुझमे यकीन है तो अभ्यास जारी रखो।”

ओकायो ने गुरु कि आज्ञा का पालन करते हुए बिना कोई प्रश्न पूछे अगले 6 साल तक उसी एक किक का अभ्यास जारी रखा।

सभी को जूडो सीखते आठ साल हो चुके थे कि तभी एक दिन गुरु जी ने सभी शिष्यों को बुलाया और बोले” मुझे आपको जो ज्ञान देना था वो मैं दे चुका हूँ और अब गुरुकुल की परंपरा के अनुसार सबसे अच्छे शिष्य का चुनाव एक प्रतिस्पर्धा के माध्यम से किया जायेगा और  इसमें विजयी होने वाले शिष्य को “सेंसेई” की उपाधि से सम्मानित किया जाएगा।”

प्रतिस्पर्धा आरम्भ हुई।

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गुरु जी ने ओकायो को उसके पहले मैच में हिस्सा लेने के लिए आवाज़ दी।

ओकायो ने लड़ना शुरू किया और खुद को आश्चर्यचकित करते हुए उसने अपने पहले दो मैच बड़ी आसानी से जीत लिए। तीसरा मैच थोडा कठिन था, लेकिन कुछ संघर्ष के बाद विरोधी ने कुछ क्षणों के लिए अपना ध्यान उस पर से हटा दिया, ओकायो को तो मानो इसी मौके का इंतज़ार था, उसने अपनी अचूक किक विरोधी के ऊपर जमा दी और मैच अपने नाम कर लिया। अभी भी अपनी सफलता से आश्चर्य में पड़े ओकयो ने फाइनल में अपनी जगह बना ली।

फाइनल में विरोधी कहीं अधिक ताकतवर, अनुभवी और विशाल था। देखकर ऐसा लगता था कि ओकायो उसके सामने एक मिनट भी टिक नहीं पायेगा।

मैच शुरू हुआ, विरोधी ओकायो पर भारी पड़ रहा था, रेफरी ने मैच रोक कर विरोधी को विजेता घोषित करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन तभी गुरु जी ने उसे रोकते हुए कहा,“ नहीं, मैच पूरा चलेगा।”

मैच फिर से शुरू हुआ।

विरोधी आत्मविश्वास से भरा हुआ था और अब ओकायो को कम आंक रहा था। इसी दंभ में उसने एक भारी गलती कर दी, उसने अपना गार्ड छोड़ दिया। ओकयो ने इसका फायदा उठाते हुए आठ साल तक जिस किक की प्रैक्टिस की थी उसे पूरी ताकत और सटीकता के साथ विरोधी के ऊपर जड़ दी और उसे ज़मीन पर धराशाई कर दिया। उस किक में इतनी शक्ति थी कि विरोधी वहीँ बेहोश हो गया और ओकायो को विजेता घोषित कर दिया गया।

मैच जीतने के बाद ओकायो ने गुरु से पूछा,” सेंसेई, मुझे आश्चर्य हो रहा है कि  मैंने यह प्रतियोगिता सिर्फ एक किक सीख कर कैसे जीत ली ?”

“ तुम दो वजहों से जीते,” गुरु जी ने उत्तर दिया।“ पहला, तुम ने जूडो की एक सबसे कठिन किक पर इतना अभ्यास कर लिया कि शायद ही इस दुनिया में कोई और यह किक इतनी दक्षता से मार पाए और दूसरा कि इस किक से बचने का एक ही उपाय है और वह है विरोधी के बाएँ हाथ को पकड़कर उसे ज़मीन पर गिराना।” और चूँकि तुम्हारा बायां हाथ नहीं है इसलिए विरोधी तुम्हारी किक से अपने आप को नहीं बचा सका ।

ओकायो समझ चुका था कि आज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थी। और वह अपने गुरु द्वारा सिर्फ एक किक पर ही अभ्यास कराने का मतलब भी समझ चुका था।

तो दोस्तों आपने देखा कि कैसे एक हाथ कट जाने के बाद भी ओकायो ने अपनी ज़िद को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया और अपनी ज़िद से अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया और जूडो का चैंपियन बना।

दोस्तों जब आप किसी चीज को पाने की जिद कर लेते हैं तो आपकी कमजोरियां भी आपकी ताकत बन जाती हैं और आप नामुमकिन को भी मुमकिन कर सकते हैं।

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10 Comments

  1. शानदार कहानी… मगर इस कहानी एक पहलु और भी हो सकता है… गुरु का योगदान… यहाँ गुरु से मेरा मतलब सिर्फ शिक्षक से नहीं हैं.. बल्कि हर उस व्यक्ति से हैं जो हमारी कमियों को भी जानकार हमारा साथ नहीं छोड़ता और हमे आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करता हैं…

    • Aapne bilkul sahi kaha Hemendra JI (@Lifestalker) ek achchha guru hamari kamiyon ko pehchan kar unhe door karta hai or hamari kamiyon ko hi hamari takat banata hai…..

      Aapka bahut bahut dhanyawad apna valuable comment dene ke liye

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